18 सितंबर की प्रस्तावित आरक्षण लॉटरी टली, अब 22 सितंबर के बाद खुलेगा किस्मत का पिटारा; मंदिरों में धोक, चौपालों पर मंथन और होटलों पर जीत-हार का गणित

सरपंच बनने का सपना देख रहे दावेदारों को फिर झटका

मेवदाकला, 15 सितंबर। ग्राम पंचायतों में सरपंच बनने का सपना संजोए बैठे संभावित दावेदारों का इंतजार एक बार फिर लंबा हो गया है। 18 सितंबर को प्रस्तावित आरक्षण लॉटरी अब टाल दी गई है। राज्य सरकार के निर्देश के बाद सरपंच व वार्ड पंच पदों की आरक्षण लॉटरी अब 22 सितंबर के बाद होने की बात सामने आई है। ऐसे में महीनों से चुनावी तैयारी में जुटे दावेदारों के चेहरे पर फिर मायूसी है, जबकि गांवों में चुनावी हलचल और तेज हो गई है।जिला परिषद सदस्य, पंचायत समिति सदस्य व प्रधान पदों की आरक्षण लॉटरी 11 अक्टूबर को तथा सरपंच व वार्ड पंच पदों की लॉटरी उपखंड स्तर पर 13 अक्टूबर को निकाले जाने की सूचना के बीच गांवों में आरक्षण को लेकर उत्सुकता और बढ़ गई है। हालांकि स्थानीय स्तर पर दावेदारों की नजर फिलहाल इस बात पर टिकी है कि सरपंच पद की आरक्षण लॉटरी आखिर किस तारीख को और किस वर्ग के लिए निकलती है।


एक पर्ची… और बदल जाएगा पूरा चुनावी गणित-गांवों में इन दिनों चुनाव की चर्चा कम और आरक्षण की पर्ची की चर्चा ज्यादा है। संभावित दावेदारों ने अपने-अपने स्तर पर समीकरण बैठाने शुरू कर दिए हैं। कौन सा वार्ड किसके पक्ष में जाएगा, कौन सा वर्ग आरक्षित होगा और आरक्षण बदलते ही कौन दावेदारी से बाहर हो जाएगा—इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द गांव की सियासत घूम रही है।लंबे समय से सरपंच पद की तैयारी कर रहे दावेदारों को सबसे बड़ा डर आरक्षण की पर्ची का है। महीनों से जनसंपर्क, सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रियता और ग्रामीणों से मेल-मुलाकात के बाद भी कोई खुलकर अपनी दावेदारी नहीं कर पा रहा है। वजह साफ है।आरक्षण की एक पर्ची पूरी रणनीति को पलट सकती है।


मंदिरों में धोक, मनौती में मांगा मनचाहा आरक्षण–चुनावी बेचैनी अब भगवान के दरबार तक पहुंच गई है। कई संभावित दावेदार मंदिरों में धोक लगा रहे हैं तो कुछ अपने पक्ष में आरक्षण निकलने की मनौती मांग रहे हैं। कोई सामान्य सीट की उम्मीद लगाए बैठा है तो कोई अपने वर्ग के लिए सीट आरक्षित होने की प्रार्थना कर रहा है।दावेदारों के लिए इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस सीट के लिए उन्होंने महीनों से तैयारी की है, कहीं आरक्षण की पर्ची उनके सारे अरमानों पर पानी न फेर दे।


चौपाल से चाय की थड़ी तक चुनावी मंथन–आरक्षण लॉटरी टलने के बाद गांवों की चौपाल, चाय की थड़ी और होटल चुनावी चर्चाओं के नए अड्डे बन गए हैं। ग्रामीण अपने-अपने हिसाब से संभावित उम्मीदवारों के नाम गिना रहे हैं। कहीं पुराने चुनावों के आंकड़े खंगाले जा रहे हैं तो कहीं नए चेहरों की ताकत और पकड़ का आकलन किया जा रहा है।चर्चाओं में एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है—“सीट किसके लिए खुलेगी और पर्ची किसके पक्ष में निकलेगी?” इसके साथ ही यह भी गणित लगाया जा रहा है कि यदि सीट किसी खास वर्ग के लिए आरक्षित हुई तो कौन मैदान में उतरेगा और यदि आरक्षण बदला तो किस दावेदार की राह आसान होगी।


समर्थकों ने भी संभाला मोर्चा–संभावित दावेदारों के साथ उनके समर्थक भी सक्रिय हो गए हैं। छोटी-छोटी बैठकों से लेकर सामाजिक आयोजनों तक में संभावित प्रत्याशियों की मजबूत और कमजोर स्थिति पर चर्चा हो रही है। कौन किसके साथ है, किसके पास कितना जनसमर्थन है और आरक्षण बदलने पर कौन किस खेमे में जाएगा—इन सवालों का हिसाब भी लगाया जा रहा है।आरक्षण स्पष्ट नहीं होने के कारण कई दावेदार दोहरी रणनीति पर चल रहे हैं। एक ओर वे जनसंपर्क बढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आरक्षण की पर्ची अपने पक्ष में नहीं आने की स्थिति में विकल्प भी तलाश रहे हैं।


किसी की तैयारी को पंख लगेंगे, किसी को करना होगा इंतजार–आरक्षण लॉटरी होते ही गांवों की चुनावी तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी। किसी दावेदार की महीनों की मेहनत को पंख लगेंगे तो किसी को अगले मौके का इंतजार करना पड़ सकता है। वहीं आरक्षित वर्ग के अनुसार कई नए चेहरे भी अचानक चुनावी मैदान में दिखाई दे सकते हैं।
फिलहाल गांवों में चुनावी बिगुल बजने से पहले आरक्षण की पर्ची ही सबसे बड़ा मुद्दा बनी हुई है। लॉटरी की पर्ची खुलने तक हर दावेदार खुद को मैदान में मानकर चल रहा है, लेकिन एक पर्ची तय करेगी कि किसके सपनों को उड़ान मिलेगी और किसे अगली पारी का इंतजार करना पड़ेगा।

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