नौकरी और कारोबार के लिए शहरों में बसे लोग अब गांव में उतर रहे चुनावी मैदान में, सरपंच से जिला परिषद तक दावेदारी; ग्रामीणों के मन में सवाल—इतने साल कहां था गांव की सेवा का जज्बा?

केकड़ी। पंचायत राज संस्थाओं के आम चुनाव 2026 की सरगर्मियों के बीच केकड़ी पंचायत समिति क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में एक दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर उभरकर सामने आ रही है। वर्षों पहले गांव छोड़कर नौकरी, व्यापार और उद्योग-धंधों के सिलसिले में शहरों में बस चुके कुछ लोग अब अपने गांव की ओर लौट रहे हैं। कोई सरपंच पद के लिए ताल ठोक रहा है, तो कोई पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य बनने की तैयारी में जुटा है। इन दावेदारों की ओर से गांव की सेवा, विकास और ग्रामीणों के उत्थान की बातें की जा रही हैं। लेकिन ग्रामीण परिवेश में रहकर गांव की रोजमर्रा की समस्याओं से जूझने वाले लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठ रहा है—अगर गांव की सेवा का इतना ही जज्बा था, तो पिछले वर्षों में गांव और ग्रामीणों के लिए क्या किया?
चुनाव आते ही क्यों जागने लगा गांव की सेवा का भाव?
गांव से शहरों की ओर पलायन करना, रोजगार तलाशना और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत करना किसी के लिए गलत नहीं है। बाहर रहकर व्यापार और नौकरी में सफलता हासिल करने वाले लोगों का अपने गांव से जुड़ना भी सकारात्मक पहल हो सकती है। लेकिन जब वर्षों तक गांव की समस्याओं से दूरी बनी रही हो और चुनाव नजदीक आते ही गांव की सेवा करने का संकल्प सामने आने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि गांव में पेयजल, सड़क, नाली, शिक्षा, चिकित्सा, स्वच्छता और रोजगार जैसी समस्याएं वर्षों से मौजूद हैं। ऐसे में चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले दावेदारों से यह जानना भी जरूरी है कि उन्होंने अपने गांव की इन समस्याओं को दूर करने के लिए अब तक क्या प्रयास किए? क्या उन्होंने कभी ग्रामीणों की समस्याओं को प्रशासन के सामने उठाया? क्या गांव के विकास के लिए कोई योजना बनाई या सामाजिक कार्यों में नियमित भागीदारी निभाई?
अब जब पंचायत राज चुनाव की बिसात बिछ रही है, तब सेवा और विकास के दावों के साथ पुराने कार्यों का हिसाब भी चर्चा का विषय बन रहा है।
खुद चुनाव नहीं जीतने का आकलन, दूसरे के कंधे पर सियासी बंदूक!
चुनावी माहौल में एक दूसरी तस्वीर भी चर्चा में है। स्थानीय राजनीतिक जानकारों और ग्रामीणों के बीच यह चर्चा है कि कुछ लोग खुद चुनावी मैदान में उतरने के बजाय अपने परिचितों, रिश्तेदारों या आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को प्रत्याशी के रूप में आगे बढ़ाने में भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे मामलों में यह सवाल उठता है कि क्या उम्मीदवार वास्तव में गांव की सेवा के उद्देश्य से मैदान में उतर रहे हैं या इसके पीछे किसी अन्य व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी काम कर रही है?हालांकि, किसी प्रत्याशी के पीछे किसी दूसरे व्यक्ति का समर्थन होना अपने आप में गलत नहीं है। लोकतंत्र में हर नागरिक को चुनाव लड़ने और किसी उम्मीदवार का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन ग्रामीणों के लिए यह समझना जरूरी है कि प्रत्याशी निर्णय लेने में कितना स्वतंत्र होगा और गांव के विकास से जुड़े फैसले अपने विवेक से ले सकेगा या किसी दूसरे व्यक्ति के प्रभाव में काम करेगा।गांव को ऐसा प्रतिनिधि चाहिए जो ग्रामीणों की आवाज बने, न कि किसी दूसरे की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का माध्यम।
विकास का विजन पहले क्यों नहीं तैयार किया?
गांव को आदर्श ग्राम या रोल मॉडल के रूप में विकसित करना केवल चुनावी मंचों से घोषणा करने से संभव नहीं है। इसके लिए वर्षों की तैयारी, समस्याओं का आकलन, बजट की जानकारी, सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन और ग्रामीणों की भागीदारी जरूरी है।यदि किसी व्यक्ति के पास आर्थिक संसाधन, प्रशासनिक संपर्क, व्यापारिक अनुभव और विकास की सोच है, तो वह चुनाव से पहले भी अपने गांव के लिए कई सकारात्मक पहल कर सकता है। जरूरतमंद विद्यार्थियों की मदद, प्रतिभाशाली युवाओं को प्रोत्साहन, स्वच्छता अभियान, जल संरक्षण, चिकित्सा शिविर, रोजगार मार्गदर्शन और गांव की बुनियादी समस्याओं को लेकर प्रशासन से संवाद जैसे कार्य किसी चुनाव की प्रतीक्षा नहीं करते।
ऐसे में सवाल यही है कि गांव को विकसित करने का विजन केवल चुनाव के समय ही क्यों सामने आता है? यदि दावेदारों ने पहले से गांव के विकास की योजना बनाई है, तो उन्हें ग्रामीणों के सामने उसका स्पष्ट खाका रखना चाहिए। केवल सेवा भाव का दावा करने के बजाय यह बताना चाहिए कि अगले पांच वर्षों में गांव की तस्वीर बदलने के लिए वे क्या करेंगे और इसके लिए संसाधन कहां से जुटाएंगे।
गांव में रहकर समस्याएं झेलने वालों की भी सुनी जाए आवाज
गांव में रहने वाले ग्रामीणों की समस्याएं केवल चुनावी मुद्दे नहीं हैं। वे प्रतिदिन पानी, बिजली, सड़क, सफाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी सुविधाओं से जुड़े सवालों का सामना करते हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर वर्षों से सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे लोगों और गांव में रहकर ग्रामीणों के बीच काम करने वालों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।बाहर रहकर लौटने वाले प्रत्याशियों के पास अनुभव, संसाधन और नई सोच हो सकती है, जो गांव के विकास में उपयोगी साबित हो सकती है। वहीं गांव में रहकर लोगों के सुख-दुख में शामिल होने वाले व्यक्तियों के पास स्थानीय समस्याओं की जमीनी समझ होती है। इसलिए चुनाव में किसी की उम्मीदवारी का आकलन उसके बाहर रहने या गांव में रहने के आधार पर नहीं, बल्कि उसके कार्यों, ईमानदारी, जनसंपर्क और विकास की स्पष्ट योजना के आधार पर होना चाहिए।
ग्रामीणों के सामने असली कसौटी—दावा नहीं, काम का हिसाब
पंचायत राज चुनाव 2026 में केकड़ी क्षेत्र की ग्राम पंचायतों से लेकर पंचायत समिति और जिला परिषद तक विभिन्न पदों के लिए दावेदारी करने वालों के सामने अब अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करने की चुनौती है। ग्रामीणों को भी प्रत्याशियों से सीधे सवाल पूछने चाहिए कि उन्होंने अब तक गांव के लिए क्या किया, निर्वाचित होने पर उनकी प्राथमिकताएं क्या होंगी, गांव की प्रमुख समस्याओं का समाधान कैसे होगा और विकास कार्यों में पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित की जाएगी।लोकतंत्र में चुनाव लड़ना हर योग्य नागरिक का अधिकार है। बाहर शहरों में रहकर लौटने वाले लोगों का स्वागत भी किया जाना चाहिए, बशर्ते उनकी मंशा वास्तव में जनसेवा की हो और वे गांव के प्रति अपनी जिम्मेदारी को चुनाव के बाद भी निभाने के लिए तैयार हों।क्योंकि गांव की सेवा किसी चुनावी मौसम का संकल्प नहीं, बल्कि निरंतर निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है। ग्रामीणों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि कौन प्रत्याशी केवल सेवा का दावा कर रहा है और कौन गांव के विकास के लिए ठोस योजना, जवाबदेही और समर्पण के साथ आगे आ रहा है। इस चुनाव में जनता को नारों से आगे बढ़कर काम, सोच और भविष्य की कार्ययोजना के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनना होगा।
