
पंचायतीराज चुनाव में जनता ने सुनाया अपना फैसला; विजेताओं के सामने वादे पूरे करने की चुनौती, पराजित प्रत्याशियों के लिए आत्ममंथन का अवसर, मतगणना पर उठे सवालों का निष्पक्ष समाधान जरूरी
सच का सफर | केकड़ी
पंचायतीराज चुनाव केवल सरपंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य चुनने की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि गांवों की दिशा और दशा तय करने का लोकतांत्रिक अवसर भी हैं। केकड़ी क्षेत्र सहित अजमेर जिले की विभिन्न ग्राम पंचायतों में हुए चुनावों के परिणामों ने कहीं खुशी के माहौल बनाए तो कहीं हार के बाद समर्थकों में मायूसी दिखाई दी। किसी प्रत्याशी के सिर जीत का ताज सजा तो किसी को बेहद कम अंतर से हार का सामना करना पड़ा। लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि जीत और हार दोनों जनता के फैसले का हिस्सा हैं।
इन चुनावों का वास्तविक मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कौन जीता और कौन हारा। असली सवाल यह है कि चुनाव के दौरान जनता से किए गए वादे कितने पूरे होंगे, गांवों की समस्याओं का समाधान कैसे होगा और क्या चुनाव के बाद भी जनप्रतिनिधि आम मतदाता के बीच उसी तरह उपलब्ध रहेंगे, जैसे मतदान से पहले दिखाई दे रहे थे?
कहीं बड़ी जीत, कहीं चंद वोटों का अंतर
केकड़ी क्षेत्र की ग्राम पंचायतों के परिणामों में मतदाताओं के अलग-अलग रुझान देखने को मिले। देवगांव में सुनीता सुवालका ने 2091 मत प्राप्त कर शारदा को 547 मतों से पराजित किया। मेवदाकलां में संतोष देवी गुर्जर ने 970 मत प्राप्त कर शांति देवी को 100 मतों से पीछे छोड़ा। कणोज में शकुंतला राठी ने 766 मत हासिल किए, जबकि उनकी निकटतम प्रतिद्वंद्वी सुशीला देवी को 455 मत मिले। मोलकिया में जयसिंह गुर्जर ने 1178 मत प्राप्त कर अंशुमान सिंह राठौड़ को पराजित किया। नायकी में रतनलाल धाकड़ ने 773 मतों के साथ जीत दर्ज की, जबकि प्रकाश चौधरी को 441 मत मिले।
मानखंड में मंजू देवी कुमावत ने 572 मत प्राप्त कर श्रवाणी गुर्जर को पीछे छोड़ा। सरसड़ी में रामराज जाट ने 219 मतों से जीत दर्ज की, जबकि जूनिया में मंजू स्वराज की जीत का अंतर महज चार मत बताया गया। लसाड़िया में रंजीत बैरवा को 725 और भंवर मेघवंशी को 723 मत मिलने के आंकड़े सामने आए। यहां केवल दो मतों के अंतर ने चुनावी मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया।
ये परिणाम बताते हैं कि लोकतंत्र में हर मत की अपनी अहमियत है। जहां बड़ी जीत प्रत्याशी के प्रति व्यापक समर्थन का संकेत देती है, वहीं कम अंतर से मिली जीत यह याद दिलाती है कि कुछ मतों का अंतर भी किसी उम्मीदवार की राजनीतिक दिशा बदल सकता है। ऐसे मुकाबलों में विजेता को अधिक विनम्रता और पराजित प्रत्याशी को धैर्य के साथ जनसेवा की भावना बनाए रखनी चाहिए।
बघेरा में संपत्ति देवी झारोटिया, भरांई में कोमल दाधीच, भीमड़ावास में रूपा देवी गुर्जर, कादेड़ा में फूलचंद खटीक, कालेरा में कृष्णगोपाल महेंद्र गर्ग, खवास में इंद्रराज चंदेल, कोहड़ा में नटवरलाल मीणा और लल्लाई में बलवीर सिंह राठौड़ की जीत भी क्षेत्र की चुनावी तस्वीर का हिस्सा बनी। इन सभी नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधियों के सामने अब अपने-अपने गांवों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की जिम्मेदारी है।
जीत के पीछे जनता का भरोसा, हार के पीछे भी संदेश
चुनाव जीतने वाला प्रत्याशी यह मानकर न चले कि पूरे गांव ने उसे समर्थन दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विजेता को अपने समर्थकों के साथ-साथ उन मतदाताओं की भी सेवा करनी होती है, जिन्होंने उसे वोट नहीं दिया। सरपंच का पद किसी एक परिवार, जाति, गुट या राजनीतिक दल की जागीर नहीं, बल्कि पूरी ग्राम पंचायत की जिम्मेदारी है।
इसी प्रकार चुनाव हारने वाले प्रत्याशी को भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से विमुख नहीं होना चाहिए। हार का अर्थ सामाजिक प्रभाव या जनसेवा की समाप्ति नहीं है। पराजित प्रत्याशी अपने समर्थकों के बीच रहकर उनकी समस्याओं को उठाते रहें, जनता के हित में आवाज बुलंद करें और अपनी कमियों का आकलन करें तो वे भविष्य में और मजबूत भूमिका निभा सकते हैं।
चुनाव में जीत और हार स्थायी नहीं होती। जनता का विश्वास काम, व्यवहार, पारदर्शिता और उपलब्धता से बनता है। इसलिए विजेता के लिए जश्न के बाद जिम्मेदारी का दौर शुरू होता है, जबकि पराजित प्रत्याशी के लिए आत्ममंथन और जनसेवा जारी रखने का अवसर सामने आता है।
मतदान के दौरान तनाव, प्रशासन के सामने निष्पक्षता की कसौटी
चुनावी प्रक्रिया के दौरान कुछ स्थानों पर तनाव और विवाद की घटनाएं भी सामने आईं। मेवदाकलां में मतदान के दौरान फर्जी मतदान की आशंका को लेकर प्रत्याशी पक्षों के बीच विवाद और झड़प की सूचना सामने आई। स्थिति संभालने के लिए पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और लाठीचार्ज की भी खबरें आईं। ऐसी घटनाएं लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं हैं। चुनाव में किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका हो तो उसका समाधान निर्धारित कानूनी प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि आपसी टकराव से।
इसी तरह अजगरा में मतगणना में गड़बड़ी के आरोपों को लेकर ग्रामीणों के आक्रोश और दोबारा मतगणना की मांग का मामला सामने आया। इन मामलों में आरोपों और प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर करना आवश्यक है। किसी पक्ष की शिकायत अपने आप में अनियमितता का अंतिम प्रमाण नहीं होती, लेकिन शिकायत को अनदेखा करना भी उचित नहीं है। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि संबंधित रिकॉर्ड, मतपत्रों और उपलब्ध दस्तावेजों की नियमानुसार जांच कराई जाए तथा शिकायतकर्ताओं को नियमानुसार जवाब दिया जाए।
लसाड़िया में भी मतगणना को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए। शिकायतकर्ता पक्ष की ओर से मतपेटी में डाले गए मतों और गिनती में प्राप्त मतों के आंकड़ों में अंतर होने का दावा किया गया। साथ ही यह आशंका जताई गई कि मतों के अंतर से चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और आधिकारिक जांच के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। यदि रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है तो उसका स्पष्ट कारण सामने आना चाहिए और संबंधित निर्वाचन नियमों के अनुसार उचित कार्रवाई होनी चाहिए।
लोकतंत्र में निष्पक्ष चुनाव जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी निष्पक्ष मतगणना पर जनता का भरोसा भी है। इसलिए जहां भी शिकायतें सामने आई हैं, वहां तथ्यों के आधार पर पारदर्शी जांच और नियमानुसार समाधान होना चाहिए। इससे न केवल शिकायत करने वाले पक्ष को संतोष मिलेगा, बल्कि निर्वाचन व्यवस्था की विश्वसनीयता भी मजबूत होगी।
चुनावी वादों से आगे बढ़कर अब विकास का हिसाब देना होगा
गांवों में पेयजल, सड़क, नालियां, स्वच्छता, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल निकासी, सार्वजनिक रास्ते और सरकारी योजनाओं का लाभ आज भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। चुनाव के दौरान इन समस्याओं को लेकर प्रत्याशी जनता के बीच पहुंचते हैं और समाधान के वादे करते हैं। अब मतदाताओं को यह देखने का अवसर मिलेगा कि उन वादों में से कितने धरातल पर उतरते हैं।
नवनिर्वाचित सरपंचों और पंचायत प्रतिनिधियों को चाहिए कि वे प्राथमिकता के आधार पर गांव की समस्याओं की सूची तैयार करें। ग्रामसभा को प्रभावी बनाएं, विकास कार्यों में पारदर्शिता रखें, सरकारी योजनाओं की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाएं और पात्र लोगों को उनका लाभ दिलाएं। विकास कार्यों में राजनीतिक विरोध या व्यक्तिगत मतभेदों के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए।
साथ ही पंचायत समिति और जिला परिषद के निर्वाचित प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। उन्हें केवल बैठकों में भाग लेने तक सीमित न रहकर क्षेत्र की मूलभूत समस्याओं को संबंधित विभागों के सामने मजबूती से उठाना होगा। जनता को भी अपने प्रतिनिधियों से कामकाज का हिसाब मांगने और ग्रामसभा में सक्रिय भागीदारी निभाने का अधिकार है।
लोकतंत्र की जीत तभी, जब गांवों में भाईचारा कायम रहे
चुनाव के दौरान समर्थकों के बीच प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। लेकिन चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद राजनीतिक मतभेदों को सामाजिक कटुता में बदलने से रोकना सभी की जिम्मेदारी है। गांवों में रहने वाले लोग चुनाव से पहले भी एक-दूसरे के पड़ोसी थे और चुनाव के बाद भी उन्हें साथ रहना है। इसलिए जीत के जुलूस में किसी का अपमान, हार के बाद बदले की भावना या राजनीतिक विरोध के कारण सामाजिक दूरी लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करती है।
विजेता प्रत्याशियों को अपने विरोधियों के प्रति सम्मानजनक व्यवहार अपनाना चाहिए। पराजित प्रत्याशियों और उनके समर्थकों को भी जनादेश का सम्मान करते हुए किसी शिकायत की स्थिति में कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी पक्ष के साथ भेदभाव न हो और कानून व्यवस्था बनी रहे।
— संपादकीय | सच का सफर, केकड़ी