
दादा घीसालाल जांगिड़ की राजनीतिक विरासत और बीसलपुर विस्थापितों के संघर्ष की पहचान बनी चुनावी चर्चा का केंद्र, युवा अधिवक्ता के समर्थन में लामबंद हो रहे मतदाता
डाबर -पंचायतीराज चुनाव को लेकर ग्रामीण अंचल में राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। टोंक जिले के बीसलपुर बांध डूब क्षेत्र में आने वाली ग्राम पंचायत डाबर में इस बार चुनावी मुकाबला खासा रोचक होता नजर आ रहा है। युवा, शिक्षित एवं पेशे से अधिवक्ता विजयलक्ष्मी जांगिड़ के चुनावी मैदान में उतरने से पंचायत का राजनीतिक माहौल गरमा गया है। उनकी उम्मीदवारी को लेकर गांवों, ढाणियों और विभिन्न सामाजिक वर्गों में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। विजयलक्ष्मी की दावेदारी के साथ ही उनके परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि, दादा घीसालाल जांगिड़ का जनसेवा का इतिहास और बीसलपुर बांध विस्थापितों के हक की लड़ाई एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है।

दादा घीसालाल जांगिड़ की क्षेत्र में रही मजबूत राजनीतिक पहचान–विजयलक्ष्मी जांगिड़ के दादा घीसालाल जांगिड़ क्षेत्र के कद्दावर जननेता के रूप में अपनी पहचान रखते थे। वे लगातार कई बार सरपंच, पंचायत समिति सदस्य एवं जिला परिषद सदस्य निर्वाचित हुए। अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने ग्रामीण विकास और आमजन की समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल में करवाए गए विकास कार्यों और जनहित से जुड़े प्रयासों को आज भी ग्रामीण याद करते हैं। केकड़ी-देवली पुराने कोटा मार्ग पर नेगड़िया पुलिया के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका रही, जिसे क्षेत्र के आवागमन और ग्रामीण सुविधा की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
बीसलपुर विस्थापितों के हक के लिए लड़ी आर-पार की लड़ाई–घीसालाल जांगिड़ की पहचान केवल पंचायत राज की राजनीति तक सीमित नहीं रही। बीसलपुर बांध के डूब क्षेत्र के विस्थापितों के अधिकारों की लड़ाई में भी उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई। वे बीसलपुर डूब क्षेत्र विस्थापित संघर्ष समिति के अध्यक्ष रहे और विस्थापित परिवारों की समस्याओं, अधिकारों तथा पुनर्वास से जुड़े मुद्दों को लेकर मजबूती से संघर्ष किया। विस्थापितों के हक की आवाज बुलंद करते हुए उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ी। डूब क्षेत्र के प्रभावित परिवारों के बीच उनकी संघर्षशील नेता की छवि रही। यही वजह है कि आज विजयलक्ष्मी के चुनाव मैदान में आने के साथ ही उनके दादा की राजनीतिक और सामाजिक विरासत की चर्चा भी तेज हो गई है।
युवा सोच, शिक्षित नेतृत्व और कानून की समझ बनी पहचान–विजयलक्ष्मी जांगिड़ शिक्षित एवं युवा वर्ग से आती हैं और वर्तमान में देवली न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत हैं। कानून और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समझ के साथ ग्रामीण समस्याओं के समाधान को लेकर उनकी सोच को उनकी प्रमुख विशेषता माना जा रहा है। पंचायत के कामकाज, सरकारी योजनाओं, प्रशासनिक जवाबदेही और ग्रामीण विकास की रूपरेखा की जानकारी होने के कारण उनसे क्षेत्र के लोगों को नई उम्मीदें दिखाई दे रही हैं। उनकी दावेदारी को युवा नेतृत्व और अनुभव से जुड़ी पारिवारिक विरासत के संगम के रूप में देखा जा रहा है।
कल्याणपुरा, कांस्या कॉलोनी, इंदौकिया सहित 36 कौम के मतदाताओं में चर्चा–ग्राम पंचायत डाबर के अंतर्गत कांस्या आने वाले कल्याणपुरा, कांस्या कॉलोनी, इंदौकिया सहित अन्य गांवों और ढाणियों में विजयलक्ष्मी जांगिड़ की उम्मीदवारी को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। विभिन्न सामाजिक वर्गों और 36 कौम के मतदाताओं के बीच जनसंपर्क के दौरान उन्हें समर्थन मिलने की बात कही जा रही है। उनकी उम्मीदवारी को लेकर समर्थकों में उत्साह नजर आ रहा है। समर्थकों का मानना है कि शिक्षित, युवा और प्रशासनिक समझ रखने वाले नेतृत्व से पंचायत में विकास कार्यों को नई दिशा मिल सकती है।
विकास और जनसमस्याओं के समाधान की उम्मीद–डाबर ग्राम पंचायत बीसलपुर बांध के डूब क्षेत्र से जुड़ी होने के कारण यहां के ग्रामीणों की अपनी विशिष्ट समस्याएं और विकास संबंधी अपेक्षाएं हैं। ऐसे में पेयजल, सड़क, मूलभूत सुविधाओं, सरकारी योजनाओं का लाभ, विस्थापित परिवारों से जुड़े मुद्दे और ग्रामीण क्षेत्रों का समग्र विकास चुनाव में महत्वपूर्ण विषय बन सकते हैं। विजयलक्ष्मी जांगिड़ की उम्मीदवारी के साथ इन मुद्दों पर भी मतदाताओं के बीच चर्चा होने लगी है। समर्थकों को उम्मीद है कि कानून की जानकारी और प्रशासनिक कार्यप्रणाली की समझ के बूते वे ग्रामीणों की समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठा सकेंगी।
विरासत के साथ नई पीढ़ी के नेतृत्व की परीक्षा–डाबर ग्राम पंचायत का यह चुनाव अब केवल सरपंच पद की दावेदारी तक सीमित नहीं रह गया है। एक तरफ घीसालाल जांगिड़ की वर्षों की राजनीतिक एवं सामाजिक पहचान है, तो दूसरी ओर विजयलक्ष्मी जांगिड़ के रूप में शिक्षित और युवा नेतृत्व की नई उम्मीद सामने है। विस्थापितों के संघर्ष से जुड़ी पारिवारिक पृष्ठभूमि और ग्रामीण विकास की अपेक्षाओं ने इस चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि डाबर पंचायत के मतदाता पुरानी राजनीतिक विरासत, संघर्ष की पहचान और नई पीढ़ी के नेतृत्व के इस समीकरण को कितना समर्थन देते हैं।