चुनाव आते ही वायरल होने लगीं ‘ग्राउंड रिपोर्ट’, जनता पूछ रही—पांच साल तक कहां था विकास का मुद्दा?
केकड़ी। नगर पालिका चुनाव की सरगर्मियां तेज होने के साथ ही इस बार चुनावी मैदान का एक नया रंग सोशल मीडिया पर दिखाई दे रहा है। वार्डों में प्रत्याशियों की गतिविधियों, जनसंपर्क और कथित विकास कार्यों को लेकर वीडियो तैयार किए जा रहे हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इन वीडियो को तेजी से प्रसारित कर मतदाताओं तक पहुंच बनाने की कोशिश हो रही है।
सोशल मीडिया आज चुनाव प्रचार का प्रभावी माध्यम बन चुका है। प्रत्याशी अपने-अपने वार्ड की ‘ग्राउंड रिपोर्ट’ के जरिए सड़क, नाली, सफाई, बिजली, पानी और अन्य स्थानीय समस्याओं तथा कराए गए कार्यों को जनता के सामने रखने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन इसी के साथ एक अहम सवाल भी उठ रहा है—यदि ये समस्याएं और विकास के मुद्दे पांच साल से वार्ड में मौजूद थे, तो चुनाव के ठीक पहले ही इनकी ग्राउंड रिपोर्ट क्यों तैयार हो रही है?
*ग्राउंड रिपोर्ट या चुनावी प्रचार का नया तरीका?*
ग्राउंड रिपोर्ट का उद्देश्य यदि वास्तविक समस्याओं को सामने लाना और जनता की आवाज को जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाना है तो यह लोकतंत्र के लिए सकारात्मक पहल है। लेकिन जब ग्राउंड रिपोर्ट केवल चुनावी प्रचार का माध्यम बन जाए और उसमें उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाने लगे, तो मतदाताओं के लिए वास्तविकता और प्रचार के बीच अंतर करना जरूरी हो जाता है।जिस वार्ड में प्रत्याशी आज सड़क, नाली, सफाई या अन्य विकास कार्यों को अपनी उपलब्धि बताकर प्रचारित कर रहे हैं, वहां जनता को यह भी देखना होगा कि इन कार्यों की जरूरत कब से थी, प्रस्ताव कब बना, काम कब स्वीकृत हुआ और वास्तव में कितना काम हुआ।
*‘चुनावी सीजन’ में अचानक सक्रियता पर सवाल*
राजनीति में चुनाव के दौरान सक्रियता स्वाभाविक है। हर प्रत्याशी जनता के बीच अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। मगर मतदाताओं के लिए असली कसौटी चुनाव से ठीक पहले की सक्रियता नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल का व्यवहार और काम होना चाहिए।यदि किसी जनप्रतिनिधि या प्रत्याशी ने पूरे कार्यकाल के दौरान वार्ड की समस्याओं को लगातार उठाया, अधिकारियों के सामने मुद्दे रखे और विकास कार्यों के लिए प्रयास किए, तो चुनाव के समय उसकी उपलब्धियों को जनता के सामने रखना स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया है।वहीं यदि पांच साल तक किसी मुद्दे पर सक्रियता नजर नहीं आई और चुनाव नजदीक आते ही अचानक उसी मुद्दे पर वीडियो, पोस्ट और ग्राउंड रिपोर्ट की बाढ़ आ जाए, तो मतदाता को सवाल पूछने का पूरा अधिकार है।
*सोशल मीडिया की ‘रेटिंग’ बनाम जनता की ‘रेटिंग’*
इस चुनाव में एक और दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है। प्रत्याशियों की राजनीतिक लोकप्रियता को अब सोशल मीडिया की पहुंच, लाइक, कमेंट, शेयर और वायरल वीडियो से भी आंकने का प्रयास किया जा रहा है।लेकिन चुनाव की असली रेटिंग सोशल मीडिया नहीं, मतदाता की राय और मतदान केंद्र पर पड़ने वाला वोट तय करेगा।सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो कुछ घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है, लेकिन वार्ड की गलियों में पांच साल तक जनता के बीच रहने वाला व्यवहार उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए मतदाताओं के लिए यह समझना जरूरी है कि वायरल होना और लोकप्रिय होना हमेशा एक ही बात नहीं होती।
*बड़े कारोबारी मैदान में, बढ़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं*
इस बार चुनावी मैदान में विभिन्न वर्गों और व्यवसायों से जुड़े लोगों की मौजूदगी भी चर्चा का विषय है। बड़े कारोबारी और आर्थिक रूप से सक्षम लोग भी राजनीति में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इससे चुनावी मुकाबला कई वार्डों में अधिक दिलचस्प हो सकता है।लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति में आर्थिक हैसियत से ज्यादा महत्वपूर्ण है जनता से जुड़ाव, व्यवहार, उपलब्धता, वार्ड की समझ और समस्याओं के समाधान की इच्छाशक्ति।राजनीति को यदि केवल प्रभाव, प्रचार और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का माध्यम बनाया जाएगा तो इसका असर अंततः जनता पर पड़ेगा। इसलिए मतदाता को यह तय करना होगा कि वह प्रचार की चमक देख रहा है या अगले पांच साल के लिए ऐसा प्रतिनिधि चुन रहा है जो जरूरत के समय उसके बीच खड़ा रहेगा।
*सड़क आज बन रही है तो सवाल कल का भी है*
चुनाव के दौरान सड़क निर्माण या अन्य विकास कार्य शुरू होना अपने आप में अच्छी बात है। जनता को विकास चाहिए और विकास कार्य होने चाहिए। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी स्वाभाविक है कि जो काम आज संभव हो रहा है, उसकी जरूरत क्या पांच साल पहले नहीं थी?
*यही सवाल चुनावी राजनीति की वास्तविक परीक्षा भी है।*
जनता को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि चुनाव से पहले कौन सा काम हुआ, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उस काम की मांग कितने समय से थी, उसे पूरा कराने के लिए किसने प्रयास किया और उसका लाभ वास्तव में कितने लोगों को मिल रहा है।
*इस बार जनता को दिखावे और काम के बीच करना होगा फैसला*
नगर पालिका चुनाव में वार्ड का मतदाता सबसे महत्वपूर्ण निर्णायक है। सोशल मीडिया प्रचार, पोस्टर, वीडियो और ग्राउंड रिपोर्ट चुनावी माहौल का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन अंतिम फैसला जनता के हाथ में होगा।
मतदाताओं के सामने इस बार सबसे बड़ा सवाल यही है—
‘पांच साल का काम देखें या पांच दिन का प्रचार?’
व्यवहार कैसा रहा?
जनता के बीच कितनी उपलब्धता रही?
वार्ड की समस्याएं कितनी बार उठाई गईं?
स्वीकृत कार्यों का वास्तविक लाभ कितना मिला?
और आने वाले पांच साल के लिए प्रत्याशी की प्राथमिकताएं क्या हैं?
इन सवालों के जवाब यदि मतदाता तलाश लेता है तो सोशल मीडिया का शोर अपने आप पीछे छूट जाएगा।
क्योंकि चुनाव में ग्राउंड रिपोर्ट कैमरा नहीं, जनता बनाती है—और उसकी रिपोर्ट का फैसला मतदान के दिन सामने आता है।