संपादकीय विश्लेषण
केकड़ी नगर पालिका चुनाव अब महज भाजपा और कांग्रेस के बीच 40 वार्डों की चुनावी लड़ाई नहीं रह गया है। चुनाव से पहले ही दोनों दलों के भीतर चल रही टिकट की खींचतान, संभावित बगावत, पुराने कार्यकर्ताओं की नाराजगी और अध्यक्ष पद को लेकर बन रहे राजनीतिक समीकरणों ने मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। ऐसे में इस चुनाव का परिणाम सिर्फ पार्टी के चुनाव चिह्न से नहीं, बल्कि प्रत्याशी चयन और संगठन के भीतर तालमेल से तय होने के आसार हैं।
पूर्व पालिकाध्यक्ष अनिल मित्तल का लंबे समय तक भाजपा में सक्रिय रहने के बाद कांग्रेस में जाना इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। डॉ. रघु शर्मा ने मित्तल को अपने पाले में लाकर कांग्रेस के लिए एक नया राजनीतिक समीकरण जरूर खड़ा किया है, लेकिन इस कदम की असली परीक्षा 40 वार्डों में होगी। व्यक्तिगत प्रभाव यदि वोट में और वोट सीट में बदलता है, तभी इस सियासी दांव को चुनावी सफलता माना जाएगा।
दूसरी ओर भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ कांग्रेस की नहीं है। सबसे बड़ी परीक्षा पार्टी के भीतर टिकट वितरण की है। जिन वार्डों में कई दावेदार हैं, वहां एक नाम तय करना और बाकी दावेदारों को साथ रखना नेतृत्व के लिए आसान नहीं होगा। टिकट से वंचित दावेदार यदि निर्दलीय मैदान में उतरते हैं या भीतर ही भीतर विरोध करते हैं तो इसका सीधा असर पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी पर पड़ सकता है।
कांग्रेस की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। मित्तल के आने से पार्टी को नया चेहरा और राजनीतिक अनुभव मिला है, लेकिन पुराने कार्यकर्ताओं और नए समीकरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी होगा। टिकट वितरण में यदि स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा का संदेश गया तो कांग्रेस को भीतर से ही नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नगर पालिका चुनाव में अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता नहीं करती। जनता 40 वार्डों से पार्षद चुनेगी और इसके बाद बोर्ड में बहुमत का गणित अध्यक्ष की कुर्सी तय करेगा। इसलिए अध्यक्ष पद के दावेदारों की सक्रियता भले ही अभी से दिखाई दे रही हो, लेकिन उनकी राजनीतिक मंजिल तक पहुंचने का रास्ता पहले वार्ड चुनाव से होकर ही गुजरेगा।
विधानसभा चुनाव में शत्रुघ्न गौतम और डॉ. रघु शर्मा के बीच हुए मुकाबले के बाद अब नगर पालिका चुनाव स्थानीय राजनीति की अगली परीक्षा है। विधानसभा में मिली हार का जवाब स्थानीय निकाय में देने की कांग्रेस की कोशिश होगी, वहीं भाजपा के सामने अपना प्रभाव और संगठनात्मक मजबूती कायम रखने की चुनौती होगी।
लेकिन इस चुनाव को केवल गौतम बनाम रघु शर्मा या भाजपा बनाम कांग्रेस के रूप में देखना शायद अधूरा विश्लेषण होगा। असली मुकाबला वार्ड स्तर पर है, जहां रिश्ते, व्यक्तिगत संपर्क, जातीय-सामाजिक समीकरण, विकास कार्यों की धारणा और प्रत्याशी की छवि कई बार पार्टी के बड़े राजनीतिक नारों पर भारी पड़ती है।
इस चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा कि कौन सा दल अपने नाराज दावेदारों को मना पाता है और कौन सा दल सही चेहरे को सही वार्ड में उतार पाता है।
मित्तल के कांग्रेस में आने से राजनीतिक पासा जरूर हिला है, लेकिन अभी पलटा नहीं है। भाजपा के पास संगठन और कार्यकर्ताओं का मजबूत आधार है तो कांग्रेस के पास बदले राजनीतिक समीकरण और नए चेहरों का सहारा। दोनों दलों के लिए अगले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण हैं।
क्योंकि नगर पालिका की कुर्सी का फैसला किसी एक नेता की लोकप्रियता से नहीं, बल्कि 40 वार्डों में बिछाई गई राजनीतिक बिसात, सही प्रत्याशी चयन और वोटों को सीटों में बदलने की क्षमता से होगा।
केकड़ी की सियासत में अब सवाल यह नहीं कि किसके पास बड़ा चेहरा है, सवाल यह है कि 40 वार्डों में किसकी चाल ज्यादा सटीक बैठती है।