
लॉटरी के बाद युवाओं में बढ़ा चुनावी जोश, सोशल मीडिया पर AI और ChatGPT से बन रहे पोस्टर; पुराने राजनीतिक चावल अभी खामोश
केकड़ी 29 सितबर
पंचायती राज चुनाव की आरक्षण लॉटरी निकलते ही गांवों में चुनावी रणभेरी बजती दिखाई देने लगी है। गांव की चौपालों से लेकर मोबाइल की स्क्रीन तक चुनावी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। कोई सरपंच बनने की तैयारी में है तो कोई वार्ड पंच, पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य की सीट पर अपनी दावेदारी तलाश रहा है। हालांकि, अभी तक अधिकांश ग्राम पंचायतों में सरपंच पद के संभावित दावेदारों ने अपने पत्ते पूरी तरह नहीं खोले हैं।
आरक्षण की स्थिति सामने आते ही युवाओं में खासा उत्साह नजर आ रहा है। कई संभावित प्रत्याशी AI और ChatGPT की मदद से आकर्षक पोस्टर तैयार करवाकर ग्राम पंचायत और क्षेत्र के WhatsApp ग्रुपों में शेयर कर रहे हैं। Instagram पर पोस्ट और Story के जरिए भी अपनी दावेदारी जताई जा रही है। सोशल मीडिया पर सक्रियता देखकर ऐसा लग रहा है कि चुनावी मैदान पूरी तरह सज चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी तस्वीर साफ होने में समय लगेगा।
पुराने राजनीतिक चेहरों की चुप्पी से समीकरण अधूरे
गांवों में चर्चा है कि युवा दावेदार भले ही सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हों, लेकिन पुराने राजनीतिक चेहरों की एंट्री के बाद ही चुनावी समीकरण पूरी तरह स्पष्ट होंगे। कई अनुभवी दावेदार अभी स्थिति को भांप रहे हैं और खुलकर मैदान में आने से बच रहे हैं। जैसे ही ये चेहरे अपने पत्ते खोलेंगे, ग्राम पंचायतों में चुनावी दंगल का वास्तविक स्वरूप सामने आने लगेगा।
3 से 4 हजार मतदाताओं वाली कई ग्राम पंचायतों में सरपंच पद के लिए संभावित दावेदारों की संख्या अभी से डेढ़ दर्जन के आसपास पहुंचती दिखाई दे रही है। आने वाले दिनों में यह संख्या और बढ़ने की चर्चा है।
प्रधान और जिला प्रमुख बनने के सपने भी
पंचायत समिति और जिला परिषद चुनाव को लेकर भी संभावित दावेदारों में उत्साह है। पंचायत समिति सदस्य बनने के साथ प्रधान पद तक पहुंचने की महत्वाकांक्षा रखने वाले लोग पार्टी टिकट के लिए भागदौड़ में जुटने लगे हैं। इसी तरह जिला परिषद सदस्य बनने की तैयारी कर रहे कई दावेदार जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने का सपना भी संजो रहे हैं।पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य के चुनाव पार्टी सिंबल पर होते हैं, जबकि सरपंच और वार्ड पंच के चुनाव बिना पार्टी सिंबल के होते हैं। ऐसे में दोनों स्तरों की चुनावी रणनीति भी अलग-अलग दिखाई दे रही है।
सोशल मीडिया से लेकर गांव की चौपाल तक चर्चा
आरक्षण लॉटरी के बाद सबसे अधिक सक्रियता सोशल मीडिया पर नजर आ रही है। संभावित प्रत्याशी अपने परिचय, फोटो और दावेदारी वाले पोस्टर बनाकर लोगों तक पहुंच रहे हैं। युवाओं में चुनाव लड़ने को लेकर उत्साह है, लेकिन जमीनी चुनावी समीकरण केवल सोशल मीडिया की सक्रियता से तय नहीं होंगे।ग्रामीणों के बीच यह भी चर्चा है कि पंचायत चुनावों में व्यक्तिगत संपर्क, सामाजिक समीकरण, रिश्तेदारी और स्थानीय स्तर पर वर्षों से बनी राजनीतिक पकड़ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे में सोशल मीडिया पोस्ट के साथ-साथ गांव की चौपालों पर होने वाली बैठकों और व्यक्तिगत संपर्कों पर भी सबकी नजर रहेगी।
बेरोजगारी और महत्वाकांक्षा से बढ़ रही दावेदारों की संख्या?
गांवों में संभावित प्रत्याशियों की बढ़ती संख्या को कुछ ग्रामीण बेरोजगारी से भी जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि गांवों में रोजगार के सीमित अवसर होने के कारण कई युवा राजनीति और पंचायत चुनाव को भविष्य बनाने के रास्ते के रूप में देख रहे हैं।वहीं ग्रामीणों के बीच यह धारणा भी चर्चा में रहती है कि सरपंच बनने के बाद व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मजबूत हो जाती है। हालांकि, ऐसी धारणाओं की वास्तविकता पंचायत दर पंचायत अलग हो सकती है और किसी भी पद को आर्थिक लाभ से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।
शिक्षा और रोजगार की ओर भी बढ़ना होगा
पंचायत चुनाव में भागीदारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन ग्रामीण युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार भी उतने ही महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। चुनावी पोस्टर और सोशल मीडिया की सक्रियता के बीच युवाओं को अपने भविष्य के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसरों पर भी ध्यान देना होगा।फिलहाल पंचायत चुनाव का माहौल धीरे-धीरे गरम हो रहा है। सोशल मीडिया पर दावेदारों की दस्तक शुरू हो चुकी है, लेकिन असली चुनावी तस्वीर तब सामने आएगी जब संभावित प्रत्याशी खुलकर मैदान में उतरेंगे। इसके बाद ही पता चलेगा कि किस ग्राम पंचायत में कौन-कौन आमने-सामने है और किसके साथ कौन सा राजनीतिक व सामाजिक समीकरण खड़ा होता है।
