संक्रमण रोगों पर मिली सफलता के बाद अब बीपी और डायबिटीज जैसी ‘साइलेंट बीमारियों’ के खिलाफ शुरू होगी नई जंग, RUHS के प्रोफेसर डॉ. प्रह्लाद धाकड़ का विशेष ग्रामीण स्वास्थ्य अभियान

जयपुर। भारत ने पिछले कुछ दशकों में संक्रमण रोगों के खिलाफ उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। एक समय था जब गांवों में टीबी, टाइफाइड, मलेरिया, पीलिया और डायरिया जैसी बीमारियां आम थीं और हजारों परिवार इनसे प्रभावित होते थे। स्वच्छता, बेहतर चिकित्सा सुविधाओं, टीकाकरण, सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रमों और जनजागरूकता के कारण आज इन रोगों पर काफी हद तक नियंत्रण संभव हुआ है। लेकिन बदलती जीवनशैली, खान-पान की आदतों, शारीरिक श्रम में कमी, तनाव और बढ़ती उम्र के साथ अब देश के सामने एक नई चुनौती तेजी से खड़ी हो रही है—गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases)।
उच्च रक्तचाप (बीपी), मधुमेह (डायबिटीज), मोटापा, हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी रोग और कैंसर जैसी बीमारियां अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहीं। ये तेजी से गांवों तक पहुंच चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि इन रोगों के शुरुआती लक्षण अक्सर दिखाई नहीं देते, इसलिए बड़ी संख्या में लोग वर्षों तक अनजान रहते हैं। जब तक बीमारी का पता चलता है, तब तक कई मामलों में हृदय, मस्तिष्क, किडनी या आंखों को गंभीर नुकसान हो चुका होता है।

अपने पैतृक गांव में ग्रामीण मरीजों की जांच एवं उपचार करते हुए RUHS के प्रोफेसर एवं वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. प्रह्लाद धाकड़।(फाइल फोटो)

इन्हीं गंभीर परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय (RUHS) कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज एवं अस्पताल, जयपुर के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. प्रह्लाद धाकड़ ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एक व्यापक स्वास्थ्य जागरूकता एवं स्क्रीनिंग अभियान शुरू करने की घोषणा की है। इस अभियान का उद्देश्य गांव-गांव पहुंचकर लोगों को बीपी और डायबिटीज जैसी बीमारियों के प्रति जागरूक करना, नियमित जांच के लिए प्रेरित करना, समय पर रोग की पहचान करना तथा जरूरतमंद मरीजों को उचित उपचार और परामर्श उपलब्ध कराना है।
डॉ. धाकड़, जो एक वरिष्ठ फिजिशियन होने के साथ-साथ एमबीबीएस, एमडी, डीएनबी और पैरामेडिकल विद्यार्थियों को चिकित्सा शिक्षा भी देते हैं, प्रतिदिन ओपीडी, वार्ड और आईसीयू में सैकड़ों मरीजों का उपचार करते हैं। उनका अनुभव बताता है कि अब अस्पतालों में बड़ी संख्या ऐसे मरीजों की आ रही है जिन्हें वर्षों तक अपने बीपी या शुगर की जानकारी ही नहीं थी। परिणामस्वरूप उन्हें हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, किडनी फेल्योर और अन्य गंभीर जटिलताओं का सामना करना पड़ रहा है।
डॉ. धाकड़ का कहना है कि “बीपी और डायबिटीज ऐसी बीमारियां हैं जिन्हें समय पर जांच और उपचार के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है। यदि हर व्यक्ति नियमित रूप से अपना रक्तचाप और रक्त शर्करा की जांच करवाए तो हजारों लोगों को समय से पहले होने वाली गंभीर बीमारियों और असमय मृत्यु से बचाया जा सकता है।”
उन्होंने बताया कि अभियान के तहत केवल जांच ही नहीं होगी, बल्कि लोगों को संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, योग, तनाव प्रबंधन, तंबाकू एवं नशे से दूरी तथा स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। विशेष रूप से 30 वर्ष से अधिक आयु के लोगों, मोटापे से ग्रस्त व्यक्तियों और पारिवारिक इतिहास वाले लोगों की स्क्रीनिंग पर जोर रहेगा।
डॉ. धाकड़ का मानना है कि विकसित भारत का सपना केवल बड़े शहरों के विकास से पूरा नहीं होगा। जब तक गांवों का प्रत्येक परिवार स्वस्थ, शिक्षित, आत्मनिर्भर और नशामुक्त नहीं होगा, तब तक समग्र विकास अधूरा रहेगा। उनका कहना है कि स्वस्थ नागरिक ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं।
उन्होंने समाज के सभी वर्गों, सामाजिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों, युवाओं और स्वास्थ्यकर्मियों से इस अभियान से जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि जनभागीदारी से ही गांवों को गंभीर बीमारियों से सुरक्षित बनाया जा सकता है।
डॉ. धाकड़ का संदेश-“समृद्धि का आधार केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि स्वस्थ परिवार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और नशामुक्त समाज है। स्वास्थ्य सेवा केवल मरीज का इलाज नहीं, बल्कि मानव सेवा और राष्ट्र सेवा का सबसे बड़ा माध्यम है। यदि हम गांवों को स्वस्थ बना सके, तो विकसित भारत का लक्ष्य स्वतः ही मजबूत हो जाएगा।”

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