सोशल मीडिया पर पोस्टर, व्हाट्सएप स्टेटस और चौपालों पर दावेदारी का शोर; जमीन पर चुनावी गणित अभी बाकी, दावेदारों की लंबी कतार ने गांवों का माहौल गरमाया
उमाशंकर वैष्णव
केकड़ी। राजस्थान में पंचायती राज चुनाव की आरक्षण लॉटरी क्या निकली, गांवों की चौपालों से लेकर मोबाइल की स्क्रीन तक चुनावी माहौल दिखाई देने लगा है। ऐसा लग रहा है मानो सरकार ने पंचायत चुनाव की नहीं, बल्कि कोई बड़ी सरकारी भर्ती की वैकेंसी निकाल दी हो। सोशल मीडिया पर रोज नए पोस्टर सामने आ रहे हैं, व्हाट्सएप स्टेटस पर दावेदारी के संदेश चल रहे हैं और गांव की गलियों से लेकर चाय की थड़ियों तक चुनाव लड़ने वालों की चर्चाएं जोर पकड़ चुकी हैं।
आरक्षण लॉटरी के बाद कई गांवों में संभावित उम्मीदवारों ने बिना देर किए अपनी-अपनी दावेदारी का एलान शुरू कर दिया है। कोई खुद को भावी सरपंच बता रहा है तो कोई वार्ड पंच के लिए समर्थकों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है। समर्थकों के फोटो, बधाई संदेश और चुनावी स्लोगन सोशल मीडिया पर ऐसे घूम रहे हैं, जैसे नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी हो। जबकि वास्तविकता यह है कि पोस्टर लगाना और चुनाव जीतने के लिए जमीन तैयार करना दो अलग-अलग बातें हैं।
लॉटरी निकली तो गांव में खुल गई ‘चुनावी वैकेंसी’
पंचायत चुनाव की आरक्षण लॉटरी के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में संभावित उम्मीदवारों की संख्या अचानक बढ़ गई है। 24 सितंबर को ग्राम पंचायतों के सरपंच और वार्ड पंच पदों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब गांवों में दावेदार अपने-अपने समीकरण बैठाने में जुट गए हैं। प्रदेश की 14,403 ग्राम पंचायतों में सरपंच पद और 1.30 लाख से अधिक वार्ड पंच पदों की आरक्षण तस्वीर सामने आई है। करीब 7,200 सरपंच पद महिलाओं के लिए आरक्षित होने की जानकारी सामने आई है।यही वजह है कि जिस गांव में कल तक दो-चार नामों की चर्चा थी, वहां आज आधा दर्जन से अधिक लोग खुद को चुनावी मैदान में बताते नजर आ रहे हैं। किसी ने पोस्टर बनवा लिया, किसी ने फोटो शूट करवा लिया और किसी ने सोशल मीडिया पर समर्थकों के साथ अपनी दावेदारी का ऐलान कर दिया।
‘रीट की वैकेंसी’ समझ बैठे चुनाव को!
गांवों में इन दिनों एक व्यंग्य खूब सुनने को मिल रहा है—”पंचायत चुनाव की लॉटरी क्या निकली, जैसे रीट की वैकेंसी निकल गई हो!”जिस तरह सरकारी नौकरी की भर्ती में युवा पात्रता देखकर आवेदन की तैयारी करते हैं, उसी तरह पंचायत चुनाव की आरक्षण श्रेणी सामने आते ही कई लोग चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट गए हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां आवेदन पत्र नहीं भरना, बल्कि गांव के मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बनानी है।चुनाव लड़ने की घोषणा करना आसान है, लेकिन गांव के हर घर तक पहुंचना, मतदाताओं से संवाद करना, पुराने रिश्तों को संभालना, विरोध और समर्थन का सामना करना तथा चुनावी खर्च की व्यवस्था करना उतना आसान नहीं है।
सोशल मीडिया के पोस्टर से नहीं बनता चुनावी आधार
आज के दौर में सोशल मीडिया चुनावी प्रचार का बड़ा माध्यम बन चुका है। लेकिन व्हाट्सएप स्टेटस पर हजार लोगों को पोस्टर दिखाई देने और उन हजार लोगों के वोट मिलने में जमीन-आसमान का अंतर है।गांव का मतदाता सोशल मीडिया पर पोस्टर देखकर वोट तय नहीं करता। वह उम्मीदवार के व्यवहार, परिवार की सामाजिक पकड़, गांव में किए गए काम, लोगों के सुख-दुख में खड़े होने और व्यक्तिगत संबंधों को भी देखता है।इसलिए सोशल मीडिया पर रोज पोस्टर चलाने वालों के सामने असली परीक्षा अब शुरू होगी। मोबाइल की स्क्रीन से निकलकर गांव की चौपाल, खेत की मेड़ और घर-घर तक पहुंचना होगा।
मारवाड़ी कहावत भी इन दिनों खूब याद आ रही
गांवों की चर्चा में एक मारवाड़ी कहावत भी सुनाई दे रही है—”जमीन दो बीघा ज्यादा होनी, तारा जैसी नालायक औलाद ना होणी।”
इस कहावत का भाव यही है कि केवल साधन या संसाधन होना पर्याप्त नहीं, उनका सही इस्तेमाल और समझदारी जरूरी है। पंचायत चुनाव में भी केवल पैसा, पोस्टर या सोशल मीडिया की चमक पर्याप्त नहीं है। उम्मीदवार के पास गांव को समझने की क्षमता, लोगों से संवाद और जिम्मेदारी निभाने की तैयारी भी होनी चाहिए।
चुनावी उत्साह के बीच ‘उधारी’ का हिसाब भी जरूरी
चुनावी दावेदारी करने वाले लोगों के लिए गांव की चौपाल से एक और सवाल उठ रहा है—पहले अपना आर्थिक हिसाब-किताब देख लिया है क्या?चुनाव लड़ने से पहले यदि किसी व्यक्ति पर निजी देनदारी, उधारी या अन्य आर्थिक जिम्मेदारियां हैं तो उन्हें समझना और व्यवस्थित करना जरूरी है। पंचायत चुनाव केवल पोस्टर और प्रचार का खेल नहीं है। इसमें समय, संसाधन और लगातार लोगों के बीच रहने की जरूरत पड़ती है।ऐसे में चुनाव लड़ने की घोषणा से पहले संभावित उम्मीदवारों को खुद से यह सवाल जरूर पूछना चाहिए कि क्या वे चुनावी मैदान में उतरने के लिए आर्थिक और सामाजिक रूप से तैयार हैं या केवल माहौल देखकर उत्साह में घोषणा कर रहे हैं?
चौपाल में बदल गए राजनीतिक समीकरण
आरक्षण लॉटरी के साथ ही गांवों में पुराने समीकरण भी बदलने लगे हैं। कहीं सामान्य सीट आरक्षित होने से पुराने दावेदार बाहर हो गए तो कहीं महिला, एससी, एसटी या ओबीसी आरक्षण ने नए चेहरों के लिए रास्ता खोल दिया। अब कई परिवारों में बैठकें शुरू हो गई हैं कि घर से किसे मैदान में उतारा जाए।कहीं पति-पत्नी, कहीं पिता-पुत्र, कहीं भाई-भाई तो कहीं परिवार और रिश्तेदारों के बीच संभावित दावेदारों को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कुछ गांवों में पुराने राजनीतिक धड़े नए चेहरे तलाश रहे हैं तो कुछ जगहों पर युवाओं ने पहली बार चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी शुरू कर दी है।
अभी पोस्टर का दौर, असली परीक्षा नामांकन के बाद
फिलहाल गांवों में चुनावी माहौल का सबसे बड़ा चेहरा सोशल मीडिया है। सुबह उठते ही नए पोस्टर, दिनभर व्हाट्सएप स्टेटस और शाम को चौपालों पर उम्मीदवारों के नामों की चर्चा।
लेकिन चुनावी प्रक्रिया का असली चेहरा नामांकन के बाद सामने आएगा। कौन मैदान में रहता है, कौन नाम वापस लेता है, किसे किसका समर्थन मिलता है और किसके सामने कौन प्रत्याशी उतरता है—इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में मिलेंगे।
राजस्थान में आरक्षण लॉटरी के बाद अब चुनाव कार्यक्रम पर नजर है। हालिया रिपोर्टों में चुनाव प्रक्रिया को नवंबर तक पूरा करने की समय-सीमा और आगामी कार्यक्रम को लेकर तैयारियों की बात सामने आई है।
गांव की जनता भी पूछ रही—’दावेदारी से पहले काम बताओ’
इन सबके बीच ग्रामीण मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति गांव के लिए क्या करना चाहता है।
कौन नाली की समस्या उठाएगा?
कौन पेयजल की समस्या के लिए आवाज उठाएगा?
कौन सड़क, बिजली और सफाई की व्यवस्था को लेकर प्रशासन तक पहुंचेगा?
कौन सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचाने में मदद करेगा?
इन सवालों के जवाब पोस्टर में नहीं, बल्कि उम्मीदवार की सोच और उसके पिछले सामाजिक व्यवहार में तलाशे जाएंगे।
पंचायत चुनाव ‘वैकेंसी’ नहीं, पांच साल की जिम्मेदारी
पंचायत चुनाव को सरकारी नौकरी की वैकेंसी समझने की बजाय पांच साल की सार्वजनिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की जरूरत है। चुनाव लड़ने का अधिकार हर पात्र व्यक्ति को है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद गांव के विकास और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करना कहीं बड़ी जिम्मेदारी है।
इसलिए अभी सोशल मीडिया पर दावेदारी का शोर भले ही तेज हो गया हो, लेकिन अंतिम फैसला गांव की जनता करेगी। पोस्टर कितने बड़े हैं, यह महत्वपूर्ण नहीं होगा; मतदाताओं के बीच भरोसा कितना बड़ा है, असली मुकाबला वहीं होगा।
फिलहाल गांवों में चुनावी चौपाल सज चुकी है। मोबाइल में पोस्टर तैयार हैं, समर्थकों की टोली सक्रिय है और दावेदार अपनी-अपनी गोटियां बिछाने में जुट गए हैं। अब देखना यह है कि जो आज सोशल मीडिया पर खुद को उम्मीदवार बता रहे हैं, उनमें से कितने नामांकन तक पहुंचते हैं और कितने गांव की पहली ही चौपाल में अपनी दावेदारी समेट लेते हैं।


